सीमाओं पर धूल उड़ती रहीं, खतरे ने दे दी है दस्तक,
मौन नहीं रहेगा देश हमारा, कभी ना झुकेगा मस्तक।
घुसपैठ की ‘काली’ छाया, बढ़ती जा रहीं है रोज़ यहाँ,
जन-जन के विश्वास पर, पड़ने लगी है धुंध जहाँ-तहाँ।
रोज़ी-रोटी, खेत और मकान, सब पे हैं संकट मंडराए,
अपने ही अधिकारों पर अब, कितने प्रश्नचिह्न लगाए।
अब बहन-बेटियों की सुरक्षा का, मुद्दा भी गंभीर हुआ,
सियासत के गलियारों में, हर चेहरा क्यों अधीर हुआ।
जनसंख्या का बदलता चेहरा, सोचने का विषय बना,
राष्ट्रहित की रक्षा करना, हरेक नागरिक का धर्म बना।
नफ़रत की दीवार ना खड़ी हो, प्रेम नहीं टूटे बीच राह,
हमें देश की सीमाओं पर, रखना होगी सख़्त निगाह।
एकता की शक्ति से ही, हर एक संकट को हर पाएँगे,
सत्य, सुरक्षा व साहस से,भारत को मजबूत बनाएँगे।
राष्ट्रहित हमारा सबसे ऊपर, यही ‘संकल्प’ जगाना है,
घुसपैठ और हर षड्यंत्र से, हिन्दुस्तान को बचाना है।
